“कभी न सोचा था”

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी,

मुस्कुराते बच्चों से इतना दूर हो जाऊँगी,

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी।

चाॅक-डस्टर छोड़कर कंप्यूटर में सिमट जाऊँगी,

उड़ते पंछी छोड़कर पीपीटी दिखाऊँगी, 

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी।

समय के साथ बच्चों में भी बदलाव लाऊँगी, 

कागज़ की जगह गूगल टेस्ट बनाऊँगी, 

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी।

गई थी एक दिन स्कूल देखने वह इमारत, 

सूनी बैंचें खाली मैदान, आँगन सुनसान कॉरिडोर वीरान, 

फिर भी उम्मीद का परचम लहराऊँगी, 

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी।

उम्मीद अभी टूटी नहीं, लहर अभी रुकी नहीं,

सपना अभी टूटा नहीं, हाथ अभी छूटा नहीं, 

वह दिन जल्द ही आएगा, हर चेहरा फिर मुस्काएगा, 

हर कक्षा शोर मचाएगी, हर शिक्षक के हाथ में लाल कलम आएगी।

अपनी कोशिश से आत्मविश्वास सबका बढाऊँगी, 

कभी न सोचा था ऑनलाइन पढ़ाऊँगी।

नम्रता सूद

एक्या स्कूल 

जे.पी. नगर

Posted by Shanthi Sivaram

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